भारत की नींद उड़ी! चीन ने बिछाया खनिजों का जाल , तोड़ने के लिए लामबंद हुए 55 देश
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पूरी दुनिया आजकल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की चमक-धमक में खोई है, लेकिन पर्दे के पीछे एक और बड़ी जंग छिड़ी हुई है। यह जंग है- क्रिटिकल मिनरल्स पर कब्जे की। लिथियम, कोबाल्ट और रेयर अर्थ जैसे ये खनिज आज की आधुनिक दुनिया की रीढ़ हैं, और इनका सबसे बड़ा खजाना चीन ने अपने कब्जे में कर लिया है।

चीन की दिवार और ग्लोबल कंट्रोल चीन ने दुनिया भर की खदानों, रिफाइनरियों और बंदरगाहों पर तेजी से अपना नियंत्रण बढ़ा लिया है। विशेषज्ञ इसे चीन द्वारा दुनिया के चारों ओर खड़ी की गई एक अदृश्य दीवार कह रहे हैं। दुनिया के 70% रेयर अर्थ और 87% प्रोसेसिंग यूनिट्स पर चीन का दबदबा है। बीजिंग का सीधा सा प्लान है—इन संसाधनों को हथियार बनाना ताकि जरूरत पड़ने पर वह किसी भी देश की सप्लाई चेन को ठप कर सके।

क्यों इतने अहम हैं ये खनिज? ये खनिज केवल मिट्टी के कण नहीं हैं, बल्कि AI, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV), सेमीकंडक्टर और आधुनिक डिफेंस हथियारों का आधार हैं। ईरान के युद्धक्षेत्र में अमेरिका जिस तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है, उसके पीछे भी इन्हीं खनिजों से बनी हार्डवेयर क्षमता है। जो देश इन खदानों और शोधन केंद्रों पर राज करेगा, वही 21वीं सदी की तकनीकी और सैन्य रेस में सबसे आगे होगा।

असहज हुआ अमेरिका, शुरू हुआ प्रोजेक्ट वॉल्ट चीन की मनमानी से तंग आकर अब दुनिया के 55 देश लामबंद हो गए हैं। अमेरिका ने प्रोजेक्ट वॉल्ट नाम की एक पहल शुरू की है, जिसमें 10 अरब डॉलर का निवेश किया गया है। इसका उद्देश्य उन खनिजों का भंडार बनाना है जो चीन पर निर्भरता को कम कर सकें। फरवरी में हुई एक बैठक में भारत और जापान समेत कई देशों ने मिलकर चीन की इस मोनोपॉली को तोड़ने की रणनीति पर चर्चा की।

भारत पर मंडराता बड़ा खतरा भारत के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। भारत अपनी जरूरत का 82% से ज्यादा क्रिटिकल मिनरल आयात करता है। साल 2024-25 में भारत ने दुर्लभ पृथ्वी चुंबकों का 93% हिस्सा सिर्फ चीन से खरीदा। अगर चीन ने अपनी सप्लाई रोकी, तो भारत के EV और डिफेंस सेक्टर ठप पड़ सकते हैं।

भारत का काउंटर-मूव क्या है? चीन की इस चाल से बचने के लिए भारत अब दुनिया भर में नए दोस्त तलाश रहा है। ऑस्ट्रेलिया, चिली, कांगो, कनाडा और ब्राजील के साथ भारत ने महत्वपूर्ण समझौते किए हैं। सरकार 3.6 अरब डॉलर की राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज परियोजना पर काम कर रही है। भारत का लक्ष्य है कि 2035 तक इन खनिजों पर अपनी निर्भरता को 95% से घटाकर 50% पर लाया जाए।

निष्कर्ष: रेस सिर्फ तकनीक की नहीं, संसाधनों की है अगली बड़ी वैश्विक प्रतिस्पर्धा न तो बोर्डरूम में जीती जाएगी और न ही प्रयोगशालाओं में। विजेता वही होगा जिसकी पकड़ खानों और रिफाइनरियों के नेटवर्क पर सबसे मजबूत होगी। चीन फिलहाल इस दिशा में मीलों आगे है, और भारत के लिए अब समय आ गया है कि वह अपने घरेलू निष्कर्षण और प्रसंस्करण (processing) में क्रांतिकारी सुधार करे, वरना तकनीकी आजादी का सपना अधूरा रह सकता है।

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