38 करोड़ का ब्लड मनी और 20 साल का संघर्ष: मौत के साए से बाहर आए अब्दुल रहीम की घर वापसी
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कोझिकोड की मिट्टी में फिर से कदम दो दशकों की लंबी कानूनी लड़ाई और मौत के साए में गुजरी जिंदगी के बाद केरल के कोझिकोड निवासी अब्दुल रहीम आखिरकार अपने घर लौट आए हैं। रियाद की जेल से रिहाई मिलने के बाद ईद के मौके पर जब वह करिपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरे, तो उनके परिजनों की आंखों में खुशी के आंसू थे।

क्या था वो मनहूस हादसा? अब्दुल रहीम 2006 में बेहतर भविष्य की तलाश में सऊदी अरब गए थे। वहां उन्हें एक 17 वर्षीय लकवाग्रस्त युवक की देखभाल का काम मिला, जो लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर जीवित था। 24 दिसंबर 2006 को गाड़ी चलाते समय रहीम का हाथ अनजाने में उस लाइफ सपोर्ट मशीन पर लग गया, जिससे युवक की मौके पर ही मौत हो गई। इस घटना के बाद स्थानीय अदालत ने रहीम को हत्या का दोषी मानते हुए मौत की सजा सुनाई।

क्या है ब्लड मनी का कानून? सऊदी अरब के इस्लामी कानून में दियाह यानी ब्लड मनी का प्रावधान है। यह एक प्रकार का मुआवजा है जो अनजाने में हुए अपराधों के लिए पीड़ित परिवार को दिया जाता है। इस मामले में मृतक के परिवार ने माफी के बदले 15 मिलियन सऊदी रियाल (करीब 38 करोड़ रुपये) की भारी-भरकम मांग रखी थी।

क्राउडफंडिंग से मिली नई जिंदगी इतनी बड़ी रकम जुटाना रहीम के परिवार के लिए असंभव था। हालांकि, उनकी जान बचाने के लिए केरल के निवासियों और दुनिया भर में बसे भारतीयों ने एकजुटता दिखाई। सोशल मीडिया और क्राउडफंडिंग के जरिए आम लोगों ने चंदा इकट्ठा किया। देखते ही देखते 38 करोड़ रुपये की राशि एकत्र हो गई, जिसे पीड़ित परिवार को सौंप दिया गया। इसके बाद ही रहीम की रिहाई का रास्ता साफ हुआ।

सऊदी प्रशासन और भारतीय दूतावास का आभार अब्दुल रहीम की रिहाई पर सऊदी स्थित भारतीय दूतावास ने खुशी जाहिर की है। दूतावास ने सोशल मीडिया पर इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी देते हुए सऊदी प्रशासन का आभार व्यक्त किया। 20 साल जेल में बिताने के बाद रहीम की यह घर वापसी न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि उन सभी लोगों के लिए एक बड़ी राहत है जिन्होंने उनकी जिंदगी बचाने में मदद की।

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