रूस-तालिबान रक्षा समझौते से बदलेगा दक्षिण एशिया का समीकरण: पाकिस्तान और अमेरिका की बढ़ी टेंशन
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अफगानिस्तान की तालिबान सरकार और रूस के बीच हुआ नया रक्षा समझौता दक्षिण एशिया की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। मॉस्को में आयोजित इंटरनेशनल सिक्योरिटी फोरम के दौरान हुए इस सैन्य-तकनीकी सहयोग समझौते ने न केवल तालिबान की स्थिति मजबूत की है, बल्कि पाकिस्तान और अमेरिका की चिंताएं भी बढ़ा दी हैं।

क्या तालिबान को मिलेंगे मिग और सुखोई? इस समझौते की सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर है कि क्या रूस अब तालिबान को उन्नत हथियार, ट्रेनिंग और फाइटर जेट्स उपलब्ध कराएगा? अब तक पाकिस्तान अपनी वायुसेना के दम पर तालिबान पर दबाव बनाता रहा है। जानकारों का मानना है कि यदि रूस तालिबान को मिग या सुखोई जैसे लड़ाकू विमान देने की दिशा में बढ़ता है, तो क्षेत्र का शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल जाएगा।

पाकिस्तान के लिए बढ़ा खतरा पाकिस्तान और तालिबान के बीच पिछले कुछ वर्षों से रिश्ते बेहद तनावपूर्ण रहे हैं। टीटीपी (TTP) के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच लगातार आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। पाकिस्तान की सीमा पर बार-बार होने वाले हमलों और तालिबान की सैन्य कमजोरी का फायदा उठाकर पाकिस्तान अक्सर आक्रामक रुख अपनाता है। रूसी सैन्य समर्थन मिलने से तालिबान की रक्षा क्षमता बढ़ेगी, जिससे पाकिस्तान का दबाव बनाने का विकल्प कमजोर पड़ सकता है।

तालिबान को वैधता, रूस को सुरक्षा तालिबान के लिए यह समझौता सिर्फ हथियारों की डील नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय वैधता की मुहर है। 2021 में सत्ता पाने के बाद दुनिया से अलग-थलग पड़े तालिबान को रूस का साथ संजीवनी की तरह मिला है। दूसरी ओर, रूस के लिए यह एक रणनीतिक चाल है। रूस को डर है कि अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकी संगठन ISIS-K मध्य एशिया और रूस के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। मॉस्को चाहता है कि तालिबान की मदद से वह उत्तरी अफगानिस्तान में अपनी सुरक्षा घेरा मजबूत करे।

इतिहास का सबसे बड़ा यू-टर्न यह पूरी घटना अंतरराष्ट्रीय राजनीति के एक अजीबोगरीब चक्र को दर्शाती है। 1980 के दशक में सोवियत संघ (रूस) और तालिबान के पूर्ववर्ती मुजाहिदीन एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन थे। उन्हीं मुजाहिदीन ने सोवियत सेना को अफगानिस्तान से खदेड़ा था। आज, दशकों बाद, रूस उसी तालिबान को सैन्य रूप से सशक्त करने की तैयारी कर रहा है, जिसे खत्म करने के लिए कभी सोवियत सेना ने अपनी जान गंवाई थी।

यह सैन्य साझेदारी निश्चित रूप से आने वाले समय में विश्व शक्तियों के लिए नई चुनौतियों और कूटनीतिक जटिलताओं को जन्म देगी।

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