सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में एक ऐसा वाकया हुआ जिसने कानूनी गलियारों और नौकरशाही की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुनवाई के दौरान जब जजों ने केंद्र सरकार से यह पूछा कि आखिर कैबिनेट मीटिंग के लिए न्यूनतम अनिवार्य संख्या (कोरम) क्या है, तो देश के सॉलिसिटर जनरल (SG) और वहां मौजूद शीर्ष आईएएस अधिकारी निरुत्तर रह गए।
अदालत में पसरा सन्नाटा सवाल बेहद सीधा था—कैबिनेट की बैठक वैध तरीके से आयोजित करने के लिए कम से कम कितने मंत्रियों का होना जरूरी है? इस सवाल पर सरकारी पक्ष की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया। कोर्ट में मौजूद आला अधिकारी एक-दूसरे का मुंह देखते रह गए। इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद कानूनविद् दिव्या कुमार सोती ने भी इसे कानूनी वकालत और नौकरशाही के गिरते मानकों का दुखद प्रतिबिंब करार दिया है।
संविधान में कैबिनेट शब्द का इतिहास हैरानी की बात यह है कि 26 जनवरी 1950 को लागू हुए मूल संविधान में कैबिनेट शब्द का उल्लेख ही नहीं था। संविधान के अनुच्छेद 74 में केवल मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) का जिक्र है। कैबिनेट शब्द को पहली बार 1978 में 44वें संविधान संशोधन के जरिए अनुच्छेद 352 में जोड़ा गया, वह भी केवल राष्ट्रीय आपातकाल के संदर्भ में।
संसद बनाम कैबिनेट का कोरम अक्सर लोग संसद और कैबिनेट के नियमों में भ्रमित हो जाते हैं। अनुच्छेद 100(3) के तहत संसद की कार्यवाही के लिए कुल सदस्यों का 10% कोरम होना अनिवार्य है। लेकिन, कैबिनेट के लिए संविधान में ऐसी कोई संख्या निर्धारित नहीं है। कैबिनेट कार्यपालिका का आंतरिक हिस्सा है, इसलिए इसे संसद के समान नियमों से नहीं बांधा गया है।
तो फिर कैबिनेट की बैठक कैसे चलती है? संविधान के अनुच्छेद 77(3) के तहत गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ट्रांजैक्शन ऑफ बिजनेस रूल्स, 1961 बनाए गए हैं। कैबिनेट सचिवालय इन्हीं नियमों के आधार पर काम करता है। इन नियमों में भी कोरम को लेकर कोई औपचारिक संख्या दर्ज नहीं है।
अघोषित नियम क्या है? कैबिनेट की कार्यप्रणाली परंपराओं और कार्य सुविधा पर आधारित है। आमतौर पर जिस मंत्रालय का प्रस्ताव चर्चा के लिए आता है, उस विभाग के कैबिनेट मंत्री की उपस्थिति को आवश्यक माना जाता है। यदि कोई मंत्री अनुपस्थित होता है, तो प्रधानमंत्री की अनुमति या मंत्रियों के समूह (GoM) के जरिए निर्णय लिए जाते हैं।
संविधान और नियमों में स्पष्ट कोरम के अभाव के कारण ही शायद सरकारी वकील अदालत में कोई निश्चित आंकड़ा पेश नहीं कर सके। यह मामला स्पष्ट करता है कि शासन की सर्वोच्च इकाई के संचालन में कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं स्पष्ट लिखित नियमों के बजाय कार्य-सुविधा पर आधारित हैं।
Solicitor General of India and top IAS officers unable to tell Supreme Court as to what is the quorum requirements of a Cabinet meeting. When asked they look at each other totally clueless. Sad reflection on the state of legal practice as well as bureaucratic standards. pic.twitter.com/fARPXZsQzj
— Divya Kumar Soti (@DivyaSoti) May 28, 2026
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