खून से लिखा अमित शाह को पत्र: गिरल माइंस आंदोलन की आग में झुलस रही बाड़मेर की सियासत
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बाड़मेर में गिरल लिग्नाइट माइंस के बाहर पिछले डेढ़ महीने से जारी श्रमिक आंदोलन अब एक बड़े राजनीतिक संकट में बदल गया है। शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी के नेतृत्व में चल रहा यह प्रदर्शन अब आर-पार की लड़ाई के मूड में है। हाल ही में कलेक्ट्रेट पर आत्मदाह की कोशिश और अब गृह मंत्री अमित शाह को खून से लिखे गए पत्र ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है।

अमित शाह के दौरे का इंतजार गृह मंत्री अमित शाह 25 और 26 मई को बीकानेर के दौरे पर हैं। आंदोलनकारियों ने इसे अपनी पीड़ा को राष्ट्रीय स्तर पर रखने का सबसे बड़ा अवसर माना है। रविवार को धरना स्थल पर मजदूरों ने सुइयों से अपने शरीर से खून निकाला और गृह मंत्री के नाम एक मार्मिक पत्र लिखा। उनका कहना है कि स्थानीय स्तर पर उनकी आवाज दबाई जा रही है, इसलिए अब वे केंद्र सरकार के हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं।

क्या हैं मजदूरों की 4 प्रमुख मांगें? आंदोलनकारी और विधायक रविंद्र सिंह भाटी चार मुख्य मांगों पर अड़े हुए हैं:

  1. स्थानीय श्रमिकों की बहाली: आरोप है कि नए ठेकेदार ने स्थानीय कर्मचारियों को हटाकर बाहरी राज्यों के लोगों को काम पर रखा है।
  2. 8 घंटे की शिफ्ट: मजदूरों का कहना है कि उनसे तय समय से अधिक काम लिया जा रहा है, जबकि श्रम कानूनों की अनदेखी की जा रही है।
  3. रोजगार में प्राथमिकता: स्थानीय युवाओं को तकनीकी आधार पर बाहर करने के बजाय उन्हें प्राथमिकता देने की मांग।
  4. पुराने समझौते का पालन: आंदोलनकारियों का दावा है कि प्रशासन की उपस्थिति में पहले जो समझौता हुआ था, कंपनी उससे मुकर गई है।

राजनीतिक खींचतान और कंपनी का पक्ष विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने इस आंदोलन को गरीबों के हक की लड़ाई बताया है और इसे राजनीतिक स्टंट कहे जाने पर तीखी नाराजगी जताई है। वहीं, स्थानीय भाजपा नेताओं का दावा है कि आंदोलनकारी बातचीत के प्रति गंभीर नहीं हैं।

दूसरी ओर, श्री मोहनगढ़ कंस्ट्रक्शन कंपनी का तर्क है कि वे नियमों के दायरे में ही काम कर रहे हैं। कंपनी प्रतिनिधियों का कहना है कि किसी भी कर्मचारी को जबरन नहीं निकाला गया है; नया टेंडर आने के बाद कुछ कर्मचारी स्वयं धरने में शामिल हुए हैं। साथ ही, वे अनावश्यक दबाव में नियमों के विरुद्ध समझौता करने से इनकार कर रहे हैं।

प्रशासन की भूमिका पर उठते सवाल इस लंबे खिंचते आंदोलन ने स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रशासन का दावा है कि समाधान के प्रयास जारी हैं और एक कमेटी इस पर काम कर रही है। हालांकि, जमीन पर कोई ठोस नतीजा न निकलने के कारण मजदूरों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है। अब सबकी निगाहें गृह मंत्री अमित शाह के बीकानेर दौरे पर टिकी हैं कि क्या वहां से इस मामले में कोई ठोस निर्देश मिलते हैं।

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