बहन जी का नया दांव: क्या यूपी में बसपा की वापसी से बदलेगी 2027 की सियासी तस्वीर?
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अभी से बिसात बिछनी शुरू हो गई है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने लखनऊ में पार्टी के सभी 75 जिलों के प्रभारियों और पदाधिकारियों के साथ उच्च-स्तरीय बैठक कर बड़ा संकेत दिया है। सालों की सुस्ती के बाद मायावती का यह आक्रामक रुख राज्य के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

अखिलेश यादव की बढ़ी चिंता मायावती की यह सक्रियता सबसे ज्यादा समाजवादी पार्टी (सपा) के लिए सिरदर्द बनी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बसपा अगर अपने कोर दलित वोट बैंक (विशेषकर जाटव) को एकजुट करने में सफल होती है, तो इसका सीधा असर सपा-कांग्रेस के इंडिया गठबंधन पर पड़ेगा। मुस्लिम और गैर-यादव ओबीसी वोटों में बसपा की सेंधमारी विपक्षी गठबंधन के लिए बड़ा झटका साबित हो सकती है।

सोशल इंजीनियरिंग का पुराना फॉर्मूला 2017 में 19 और 2022 में महज 1 सीट पर सिमटने के बाद, बसपा अब अकेले चलो की नीति पर है। मायावती एक बार फिर अपने पुराने सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले—दलित, ओबीसी, ब्राह्मण और मुस्लिम—को साधने की कोशिश कर रही हैं। लखनऊ बैठक में उन्होंने दागी प्रत्याशियों को टिकट न देने और बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं।

किसे होगा फायदा, किसकी उड़ेगी नींद? यूपी की राजनीति का पुराना इतिहास रहा है कि जब भी मुकाबला त्रिकोणीय होता है, तो उसका सीधा लाभ सत्ताधारी दल को मिलता है। यदि बसपा मजबूती से चुनाव लड़ती है और विरोधी वोटों का बंटवारा होता है, तो इसका सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को हो सकता है। बीजेपी अपना कैडर वोट बैंक बचाकर एक बार फिर बाजी मारने की स्थिति में आ सकती है।

अस्तित्व की लड़ाई या सत्ता की वापसी? मायावती के लिए 2027 का चुनाव अपनी पार्टी का वजूद बचाने की अंतिम कोशिश हो सकता है। बसपा का दोबारा उभार विपक्ष के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के समीकरण को बिखेर सकता है। क्या मायावती वाकई अपनी खोई जमीन वापस पा सकेंगी, या यह महज एक औपचारिकता बनकर रह जाएगा? यह आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन उत्तर प्रदेश की सियासत अब त्रिकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ती दिख रही है।

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