लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के फैजुल्लागंज वार्ड में लंबे समय से चला आ रहा सियासी सस्पेंस आखिरकार खत्म हो गया है। समाजवादी पार्टी के ललित किशोर तिवारी ने आखिरकार पार्षद पद की शपथ ले ली है। यह शपथ उन्हें हाईकोर्ट की कड़ी फटकार और मेयर के अधिकार सीज करने की चेतावनी के बाद दिलाई गई।
क्या था पूरा विवाद? 2023 के निकाय चुनाव में बीजेपी के प्रदीप शुक्ला ने जीत दर्ज की थी, जबकि ललित किशोर बहुत कम वोटों के अंतर से चुनाव हार गए थे। चुनाव के बाद ललित किशोर ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि प्रदीप शुक्ला ने नामांकन के दौरान हलफनामे में अपनी संपत्ति और पारिवारिक जानकारी छिपाई थी।
क्यों कुर्सी गंवानी पड़ी प्रदीप शुक्ला को? ललित किशोर के आरोपों की जांच में पाया गया कि प्रदीप शुक्ला ने अपनी दो पत्नियों और करोड़ों रुपये की संपत्ति (जमीन-मकान) का ब्यौरा छुपाया था। हाईकोर्ट के जज राजन राय की पीठ ने इन आरोपों को सही पाया। दिसंबर 2025 में कोर्ट ने प्रदीप शुक्ला को पार्षद पद के अयोग्य घोषित करते हुए उन्हें हटाने का आदेश दिया।
शपथ में क्यों हुई तीन महीने की देरी? कोर्ट ने 4 फरवरी 2026 को ही ललित किशोर को पार्षद के रूप में शपथ दिलाने का आदेश दिया था। लेकिन, नगर निगम प्रशासन ने इस आदेश को तीन महीने तक ठंडे बस्ते में डाले रखा। जब इसके बावजूद शपथ नहीं हुई, तो ललित किशोर को दोबारा अदालत की शरण लेनी पड़ी।
मेयर को मिली सख्त नसीहत हाईकोर्ट ने इस मामले में बेहद कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने मेयर सुषमा खर्कवाल को निर्देश दिया कि वे रविवार के दिन ही ललित किशोर को शपथ दिलाएं। हालात इतने बिगड़ गए थे कि कोर्ट को मेयर के अधिकार तक सीज करने की चेतावनी देनी पड़ी।
सपा खेमे में जश्न का माहौल शुक्रवार, 24 मई को आखिरकार मेयर ने ललित किशोर तिवारी को शपथ दिलाई। इस मौके पर समाजवादी पार्टी के समर्थकों और नेताओं ने कानून जिंदाबाद और सत्यमेव जयते के नारे लगाकर अपना आक्रोश और खुशी जाहिर की। अब फैजुल्लागंज वार्ड को नया पार्षद मिल गया है, लेकिन इस प्रक्रिया में हुई लेटलतीफी नगर निगम की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर गई है।
*लखनऊ नगर निगम में आखिरकार वही हुआ, जो शुरुआत में ही हो जाना चाहिए था।
— AJEET PRATAP SINGH (@ajeetsingh1979) May 24, 2026
मेयर सुषमा खर्कवाल ने ललित तिवारी को शपथ दिला दी, लेकिन तब… जब हाईकोर्ट की सख्ती के बाद हालात यहां तक पहुंच गए कि मेयर के अधिकार तक सीज करने पड़े।
अगर कोर्ट के पहले आदेश के बाद ही शपथ ग्रहण करा दिया जाता, तो न… pic.twitter.com/vX4taKlzGK
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