बंगाल में बुलडोजर युग का आगाज़: ममता बनर्जी की पार्टी से छिना ठिकाना, दफ्तर खाली करने का अल्टीमेटम
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कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 के सत्ता परिवर्तन के बाद से ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए संकट गहराता जा रहा है। सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद से सूबे में प्रशासनिक और कानूनी शिकंजा कसता जा रहा है। अब ममता बनर्जी की पार्टी के सामने अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने के साथ-साथ दफ्तरों को बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

किराए के दफ्तर से बेदखल हुई टीएमसी सबसे बड़ा झटका कोलकाता के मेट्रोपॉलिटन इलाके में स्थित उस अस्थायी तृणमूल भवन को लगा है, जहां से पार्टी की प्रमुख गतिविधियां संचालित हो रही थीं। चूंकि टोपसिया स्थित मुख्य कार्यालय का रिनोवेशन चल रहा है, इसलिए तमाम बड़े नेता इसी इमारत में जुटते थे। अब मकान मालिक मंटू साहा ने लीज एग्रीमेंट बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया है और कानूनी नोटिस भेजकर दो महीने के भीतर इमारत खाली करने का अल्टीमेटम दे दिया है।

आसनसोल में चला प्रशासन का पीला पंजा कोलकाता के बाहर भी तृणमूल के अवैध ठिकानों पर गाज गिर रही है। शनिवार को आसनसोल (बर्नपुर) में सेल-आईएसपी प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन ने संयुक्त अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया। इस कार्रवाई में टीएमसी के कद्दावर पार्षद अशोक रुद्र के उस कार्यालय को ढहा दिया गया, जो सरकारी जमीन पर अवैध रूप से कब्जा करके बनाया गया था। देखते ही देखते बुलडोजर ने इलाके के अन्य अवैध राजनीतिक ढांचों को भी जमींदोज कर दिया।

बदले की राजनीति या कानून का राज? इस कार्रवाई के बाद तृणमूल कांग्रेस ने इसे पूरी तरह राजनीतिक बदले की भावना करार दिया है। पार्टी नेताओं का आरोप है कि भाजपा सरकार विपक्ष की आवाज दबाने के लिए दमनकारी नीतियों का सहारा ले रही है। वहीं, टीएमसी के विधायक और कार्यकर्ता विधानसभा परिसर में विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं।

भाजपा का दो-टूक जवाब: अवैध कब्जा बर्दाश्त नहीं दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने टीएमसी के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। स्थानीय भाजपा विधायक कृष्णेंदु मुखर्जी ने सख्त लहजे में कहा, यह बंगाल में कानून-व्यवस्था की बहाली है। सरकारी जमीन और गरीबों के हक पर डाका डालने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। अवैध निर्माण चाहे किसी भी दल का हो, उसे ध्वस्त किया जाएगा।

टीएमसी के सामने अस्तित्व का संकट बंगाल की बदली हुई सत्ता और उसके आक्रामक रुख ने टीएमसी के जमीनी ढांचे को हिलाकर रख दिया है। केवल एक-दो जगहों पर ही नहीं, बल्कि राज्य के कई अन्य जिलों से भी खबरें आ रही हैं कि मकान मालिक एग्रीमेंट रिन्यू करने से बच रहे हैं। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आने वाले दिनों में वे अपने राजनीतिक कार्यक्रमों के लिए नया ठिकाना कहां से जुटाएंगे। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि यह केवल शुरुआत है और आने वाले दिनों में यह बुलडोजर और कहां तक जाएगा।

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