मेलोडी का इंटरनेशनल जलवा: 1 रुपये की टॉफी जिसने विदेशी ब्रांड्स को चटाई धूल
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सोशल मीडिया पर इन दिनों एक ही सवाल छाया है— आखिर मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है? यह चर्चा तब शुरू हुई जब इटली के रोम दौरे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहां की पीएम जॉर्जिया मेलोनी को तोहफे में पारले की मशहूर मेलोडी चॉकलेट भेंट की। दोनों नेताओं की मुस्कुराती तस्वीरें वायरल होते ही यह 43 साल पुरानी टॉफी फिर से चर्चा के केंद्र में आ गई है।

कैसे शुरू हुई मेलोडी की कहानी? पारले प्रोडक्ट्स की नींव 1929 में मोहनलाल दयाल चौहान ने मुंबई के विले पार्ले में रखी थी। बिस्कुट बाजार में अपना लोहा मनवाने के बाद कंपनी ने चॉकलेट सेगमेंट में कदम रखा। 1983 में जब मेलोडी लॉन्च हुई, तो भारतीय बाजार में कैडबरी डेयरी मिल्क और नेस्ले मिल्कीबार जैसे दिग्गज विदेशी ब्रांड्स का कब्जा था।

कीमत बनी सफलता की चाबी उस दौर में प्रीमियम चॉकलेट्स आम आदमी की पहुंच से दूर थीं। पारले ने एक मास्टरस्ट्रोक चला और सिर्फ 1 रुपये में डबल लेयर वाली चॉकलेट पेश की। बाहर से चॉकलेटी और अंदर से क्रीमी मेलोडी ने लोगों को महज एक रुपये में प्रीमियम स्वाद का अहसास कराया।

विदेशी दिग्गजों को कैसे पछाड़ा? मेलोडी की सफलता के पीछे तीन मुख्य कारण रहे:

  1. किफायती दाम: 1 रुपये की कीमत ने इसे गांव से लेकर शहर के हर बच्चे और मिडिल क्लास की पहली पसंद बना दिया।
  2. इनोवेशन: 2-इन-1 फ्लेवर ने इसे बाजार की साधारण टॉफियों से अलग खड़ा कर दिया।
  3. मार्केटिंग का जादू: ये मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है? विज्ञापन अभियान ने एक ऐसा रहस्य पैदा किया कि यह स्लोगन लोगों की जुबान पर चढ़ गया।

16,000 करोड़ का साम्राज्य आज पारले एक प्राइवेट इंटरप्राइज है, जिसे चौहान परिवार संभाल रहा है। वित्त वर्ष 2025 में कंपनी का कुल रेवेन्यू 16,191 करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जिसमें मेलोडी का बड़ा योगदान है। भारत के कन्फेक्शनरी मार्केट में 15 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली इस कंपनी की मार्केट वैल्यू आज 8 से 10 अरब डॉलर के बीच है।

चौहान परिवार की नेटवर्थ लगभग 5.5 अरब डॉलर आंकी गई है। फिलहाल, यह दिग्गज कंपनी अपने अगले बड़े कदम के तौर पर IPO लाने की तैयारी में है। पीएम मोदी द्वारा मेलोनी को दी गई इस मेलोडी ने न केवल दोनों देशों के बीच मिठास घोली, बल्कि एक भारतीय ब्रांड की वैश्विक पहचान को भी फिर से ताजा कर दिया।

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