एयरपोर्ट पर हाई-वोल्टेज ड्रामा: एयर फोर्स वन में चढ़ने से पहले अमेरिकी स्टाफ ने चीनी गिफ्ट्स को डस्टबिन में क्यों फेंका?
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बीजिंग से अमेरिका लौटते समय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के काफिले में एक हैरान कर देने वाली घटना देखने को मिली। एयर फोर्स वन में सवार होने से ठीक पहले, पूरे अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने चीन से मिले सभी उपहारों और उपकरणों को विमान की सीढ़ियों के नीचे रखे कचरे के डिब्बों में फेंक दिया।

क्या-क्या फेंका गया? चीन यात्रा के दौरान प्रतिनिधिमंडल को कई चीजें दी गई थीं, जिनमें क्रेडेंशियल्स, डेलीगेशन पिन, स्मृति चिन्ह (सोवेनियर) और स्टाफ व मीडिया के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए बर्नर फोन शामिल थे। व्हाइट हाउस के सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत इन सभी वस्तुओं को विमान के अंदर ले जाने पर सख्त मनाही थी।

ट्रंप की सफाई: यह कैसी सुरक्षा? डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर इस घटना की पुष्टि करते हुए इसे पूरी तरह से सुरक्षा प्रोटोकॉल का हिस्सा बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन में निर्मित किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या वस्तु को विमान के अंदर ले जाने की इजाजत नहीं थी। घर वापसी के लिए सभी व्यक्तिगत उपकरणों को पहले ही फैराडे बैग (जो सिग्नल को ब्लॉक करते हैं) में सुरक्षित रखवा दिया गया था।

जासूसी का डर या कूटनीतिक चाल? जब ट्रंप से कैमरे पर इस जासूसी रणनीति को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने बेबाकी से जवाब दिया, हमने इस पर अलग से चर्चा नहीं की क्योंकि हम भी उन पर उतनी ही जासूसी करते हैं जितनी वे हम पर करते हैं। जानकारों का मानना है कि यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं, बल्कि अमेरिका की दशकों पुरानी काउंटर-इंटेलिजेंस प्लेबुक का हिस्सा है, जिसे बीजिंग और मॉस्को जैसे देशों में सख्ती से लागू किया जाता है।

कैमरे में कैद हुई वाशिंगटन की असली सोच यूं तो ऐसी सुरक्षा कार्रवाई अक्सर पर्दे के पीछे होती है, लेकिन इस बार यह सब कैमरे में कैद हो गया। न्यूयॉर्क पोस्ट की व्हाइट हाउस संवाददाता एमिली गुडिन ने बताया कि सीढ़ियों के नीचे इन उपहारों का ढेर लग गया था। भले ही यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच हाथ मिलाने वाली तस्वीरें खिंचवाई गईं, लेकिन विमान में चढ़ते वक्त सुरक्षा का यह सख्त रवैया साफ बयां करता है कि वाशिंगटन की नजर में बीजिंग का स्थान क्या है।

अंततः, जब एयर फोर्स वन ने उड़ान भरी, तो विमान के अंदर चीन की एक भी पिन या फोन मौजूद नहीं था। यह घटना दिखाती है कि वैश्विक राजनीति में कूटनीति के साथ-साथ डिजिटल सुरक्षा के दांव-पेच कितने गहरे होते हैं।

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