पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के सत्ता से बाहर होने और बीजेपी के काबिज होने के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों, विशेषकर तीस्ता जल बंटवारे पर हलचल तेज हो गई है। बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने इस राजनीतिक बदलाव पर प्रतिक्रिया देते हुए उम्मीद जताई है कि अब तीस्ता संधि पर चर्चा का रास्ता साफ होगा।
तीस्ता पर जीवन-मरण का सवाल बांग्लादेश के विदेश मंत्री का स्पष्ट मानना है कि तीस्ता जल साझाकरण समझौता केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि उस क्षेत्र के लोगों के लिए जीवन और मृत्यु का सवाल है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में नई सरकार के गठन के बाद इस पर निश्चित रूप से चर्चा की जाएगी, क्योंकि अब वे राजनीतिक बाधाएं नहीं रहीं जो पूर्ववर्ती टीएमसी सरकार के दौरान रुकावट का कारण बनी थीं।
बीजेपी की चुनौती और चुनावी एजेंडा पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने बांग्लादेश से जुड़े मुद्दों जैसे—अवैध घुसपैठ, राष्ट्रीय सुरक्षा और बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति को केंद्र में रखा था। बीजेपी का डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट का नारा और सीमा प्रबंधन को लेकर सख्त रुख अब राज्य और केंद्र दोनों ही स्तरों पर बीजेपी की नीति का हिस्सा होगा।
क्या स्थानीय दबाव अब भी बरकरार रहेगा? विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बीजेपी के सत्ता में आने से ही तीस्ता समझौता आसान नहीं होगा। साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के डॉ. धनंजय त्रिपाठी के अनुसार, बीजेपी सरकार को अब राज्य स्तर पर भी स्थानीय भावनाओं का ख्याल रखना होगा। पश्चिम बंगाल की जनता और वहां के कृषि हितों को दरकिनार करना केंद्र के लिए भी एक बड़ी चुनौती हो सकती है।
दिल्ली से बातचीत की नई रणनीति अंतरराष्ट्रीय मामलों की जानकारों का तर्क है कि बांग्लादेश अब कोलकाता के बजाय सीधे दिल्ली से वार्ता को प्राथमिकता दे रहा है। ऐसे में बीजेपी के पास एक स्थिर और रचनात्मक संबंध बनाने का स्वर्ण अवसर है। हाल ही में दिनेश त्रिवेदी को उच्चायुक्त के पद पर नियुक्त करना यह संकेत देता है कि केंद्र सरकार बांग्लादेश के साथ संबंधों को एक नई, राजनीतिक मजबूती देना चाहती है।
अतीत से सबक और भविष्य की राह बांग्लादेश के विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने पिछले अनुभवों से सबक लिया है। शेख हसीना के दौर में जो गुडविल की कमी महसूस की गई थी, उसे दूर करने के लिए तीस्ता समझौता एक मास्टरस्ट्रोक हो सकता है। हालांकि, ध्रुवीकरण की राजनीति और घरेलू दबाव के बीच मोदी सरकार को एक संतुलित रुख अपनाना होगा, ताकि दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक स्थिरता बनी रहे।
अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है। देखना यह होगा कि क्या बीजेपी अपनी चुनावी बयानबाजी से हटकर तीस्ता के मसले पर कोई व्यावहारिक समाधान निकाल पाती है, या राज्य के स्थानीय हितों का दबाव इस बार भी समझौते की राह में रोड़ा बनेगा।
*Bangladesh’s Foreign Minister, Dr. Khalilur Rahman, made a prudential opinion about political development in the West Bengal. International relations are never based on emotions only. pic.twitter.com/o0nzM5oVSv
— Dr. Mizanur Rahman (@mizanrsharif) May 5, 2026
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