इस्लामाबाद: पाकिस्तान की मध्यस्थता में चल रही अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक शांति वार्ता विफल हो गई है। 1979 की क्रांति के बाद पहली बार हुई इस उच्चस्तरीय सीधी बातचीत के नाकाम होने से मिडिल ईस्ट में तनाव और गहराने की आशंका बढ़ गई है।
ईरान का कड़ा रुख वार्ता विफल होने के बाद ईरान की ओर से पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आई है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के प्रवक्ता इब्राहिम ज़ुल्फिकारी ने कहा कि ईरान किसी भी सूरत में अमेरिका की सरेंडर वाली शर्तें स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान अपने हितों और शर्तों पर कोई समझौता नहीं करेगा।
परमाणु कार्यक्रम बना सबसे बड़ा रोड़ा अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बताया कि वार्ता के विफल होने का मुख्य कारण ईरान का अपने परमाणु कार्यक्रम को रोकने से इनकार करना है। वेंस ने कहा, हमें ईरान से एक ठोस प्रतिबद्धता चाहिए थी कि वे परमाणु हथियार विकसित नहीं करेंगे, लेकिन उन्होंने हमारी शर्तें मानने से मना कर दिया।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति का सख्त संदेश पाकिस्तान से रवाना होने से पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जेडी वेंस ने कहा कि अमेरिका ने अपना अंतिम और सर्वोत्तम प्रस्ताव पेश किया था। उन्होंने कहा, ईरान ने हमारी शर्तों को ठुकराने का विकल्प चुना है। यह अमेरिका के लिए नहीं, बल्कि ईरान के लिए ज्यादा बुरी खबर है। हमने अपनी रेड लाइन्स स्पष्ट कर दी हैं, जिन पर कोई समझौता संभव नहीं है।
इस्लामाबाद में हाई अलर्ट का असर नहीं इस वार्ता के लिए इस्लामाबाद में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। रेड ज़ोन समेत पूरे शहर में 10,000 से अधिक सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया था और हाई अलर्ट जारी था। दुनिया भर की नजरें इस बातचीत पर टिकी थीं कि क्या इससे पश्चिम एशिया में जारी युद्ध पर विराम लग पाएगा, लेकिन वार्ता की विफलता ने शांति की उम्मीदों को करारा झटका दिया है।
अब आगे क्या? वार्ता विफल होने के बाद अमेरिकी टीम देश लौट चुकी है। जानकारों का मानना है कि इस विफलता के बाद अब मिडिल ईस्ट में संघर्ष का दायरा और बढ़ सकता है। ईरान ने अपनी शर्तों पर अडिग रहने की बात कहकर संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में कूटनीतिक दबाव के बजाय तनाव और बढ़ने के आसार हैं।
Vice President JD Vance gives an update in Pakistan:
— The White House (@WhiteHouse) April 12, 2026
The simple fact is that we need to see an affirmative commitment that they will not seek a nuclear weapon, and they will not seek the tools that would enable them to quickly achieve a nuclear weapon. pic.twitter.com/il4THN5DwV
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