होर्मुज में बवाल के बीच जयशंकर ने फेंका ऐसा पासा , दुनिया के पावरफुल देशों के माथे पर आया पसीना, चीन बना बड़ा विलेन
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ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जारी संकट ने पूरी दुनिया को एक गंभीर ऊर्जा संकट की ओर धकेल दिया है। इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की विफलता खुलकर सामने आ गई है। ऐसे में भारत ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर अपनी मुखर आवाज बुलंद की है।

UNSC की नाकामी और भारत की दो टूक ईरान-इजरायल विवाद ने यह साबित कर दिया है कि सुरक्षा परिषद अपनी प्राथमिक जिम्मेदारियों को निभाने में नाकाम रही है। न तो होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को बाधित होने से बचाया जा सका और न ही किसी ठोस निंदा प्रस्ताव पर आम सहमति बन पाई। फ्रांस में आयोजित G-7 विदेश मंत्रियों की बैठक में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस स्थिति पर करारा प्रहार किया और स्पष्ट कहा कि मौजूदा वैश्विक ढांचा आउटडेटेड हो चुका है।

चीन की बाधा और भारत की मांग भारत लंबे समय से UNSC में स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है, ताकि ग्लोबल साउथ की आवाज को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके। हालांकि, सुरक्षा परिषद में चीन का वीटो अक्सर भारत के इस दावे में सबसे बड़ा रोड़ा बनता रहा है। जयशंकर ने G-7 के मंच से सीधे तौर पर ग्लोबल गवर्नेंस में सुधार की मांग उठाई, जिससे दुनिया के शक्तिशाली देशों का ध्यान फिर से इस असंतुलन की ओर आकर्षित हुआ है।

ग्लोबल साउथ की आवाज बने जयशंकर केवल सुरक्षा ही नहीं, जयशंकर ने ग्लोबल साउथ के उन देशों का पक्ष रखा जो इस युद्ध की आग में सबसे ज्यादा झुलस रहे हैं। ऊर्जा संकट, उर्वरक की कमी और खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दों को उठाकर भारत ने फिर से विकासशील देशों के लीडर के रूप में अपनी भूमिका स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि वैश्विक चुनौतियों का समाधान तभी संभव है जब सामूहिक प्रयासों के साथ ढांचे में आमूलचूल बदलाव किए जाएं।

होर्मुज संकट और भारत की चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस गुजरता है। इस मार्ग पर कोई भी आंच आने का सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है। G-7 बैठक के दौरान जयशंकर की प्राथमिकता इस समुद्री मार्ग को सुरक्षित और खुला रखने की रणनीति बनाना है।

क्यों अहम है यह बैठक? G-7 में कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देश शामिल हैं। भारत के साथ सऊदी अरब, दक्षिण कोरिया और ब्राजील को विशेष निमंत्रण यह दर्शाता है कि भविष्य के वैश्विक फैसलों में भारत की भागीदारी कितनी अपरिहार्य हो गई है। जयशंकर की यह कूटनीतिक चाल दुनिया के उन देशों को सोचने पर मजबूर करेगी जो अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं।

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