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नंगे पैर , पेट में पथरी और जीत लायी गोल्ड मेडल : शेर बिटिया की कहानी

कभी कभी गरीबी इंसान से वो सब करवा देती है जिसपर न तो वाह कहते बनता है और न चुप रहते । ऐसे हालत पर कलम भी जवाब दे जाती है क्या लिखा जाए कितना लिखा जाए । ये कहानी नही हकीकत है बक्शो देवी की । हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के इंदिरा स्टेडियम में हुई ५००० मीटर की दौड़ गवाह बनी एक बेबसी की जीत की ।

ऊना जिले के स्कूल में पढ़ने वाली इस अति गरीब छात्रा ने सभी को हैरान कर दिया । जैसे ही दौड़ शुरू हुई सभी ने एक ऐसा नज़ारा देखा जिसे बढ़ते भारत का सपना देखने वाला कोई स्वीकार नही कर पाता, शून्य से भी नीचे तापमान में एक लड़की नंगे पाँव दौड़ में आके खड़ी हो गई है । न पैर में जूते थे और न धावकों जैसे स्पोर्ट्स आउटफिट्स,उसके विरोधी जूतों और किट के साथ ट्रेक पर थे । जैसे ही दौड़ शुरू हुई बक्शो देवी सबको पीछे छोड़ती हुई बढ़ती जा रही थी , गला देने वाली ठण्ड में उसके नंगे पैर जैसे सख्त धरती से अपना हक छीनने को संघर्ष कर रहे थे, ये दृश्य तब आँखों में आंसू ला देने वाला हो गया जब यह बालिका धावक पेट में पथरी के दर्द को बार बार संभालती और दौड़ने को जोर लगाती । ठण्ड , गरीबी,बिमारी , दर्द और हिम्मत की लड़ाई में आखिरकार बक्शो जीत गयी । इस प्रतियोगिता में बक्शो ने स्वर्ण पदक जीता और पुरूस्कार राशि के रूप में ६००० रूपये भी । बक्शो देवी के पिता नहीं हैं , माँ किसी तरह घर का गुज़ारा किया करती हैं , ऐसे में बक्शो के उच्च शिक्षा के सपने संघर्ष करने को मज़बूर हैं

पुरूस्कार में मिली 6,000 रुपए की राशि को बक्शो देवी अपनी मां को देना चाहती हैं ताकि घर के गुज़ारे में कुछ सहयोग किया जा सके , घोर गरीबी के चलते बक्शो देवी के भाई-बहन माध्यमिक शिक्षा से आगे नहीं पढ़ पाए हैं ,लेकिन बक्शो देवी किसी भी तरह से उच्च शिक्षा हासिल करना चाहती है साथ ही वे खेलों में भी ऊंचा स्थान हासिल करने का जज्बा रखती हैं। बख्शो देवी अपने 10 वर्षीय भाई को भी पढ़ाना चाहती है।

बक्शो की कहानी मन में कई सवाल छोड़ जाती है , और जवाब चुप चाप शून्य को ताका करते हैं ।

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