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U टर्न क्या, राजनीति की जलेबी हैं केजरीवाल

देश में राजनीति और राजनीति में चरित्र कब बदल जाए किसी को पता नहीं ! ये बात दिल्ली CM केजरीवाल पर कुछ ज्यादा ही सटीक लगती है ; चुनाव जीतने के बाद से जिस तरह का व्यक्तित्व अरविन्द ने पेश किया है , उससे न सिर्फ उनके समर्थकों ,बल्कि विरोधियों को भी हैरानी है | रामलीला मैदान में अन्ना की ऊँगली पकड़ कर जो केजरीवाल राजनीति में शुचिता और सादगी की मांग किया करते थे, वे आज भारी वेतन की वकालत करते हैं | भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ने वाले केजरीवाल, एक अफसर पर पड़े छापे से इस कदर बौखलाए जैसे कोई शत्रु-देश का नेता भड़कता है | आइये आज एक नज़र डालते हैं कि जिन उम्मीदों पर बैठ कर केजरीवाल CM की कुर्सी पर चढ़े थे, वे उम्मीदें अब कितना पीछे छूट चुकी हैं |

सबसे पहले ईमानदारी

अन्ना आंदोलन के समय ये केजरीवाल ही थे , जो चाहते थे कि हर स्तर के मंत्री की जांच बेरोक-टोक हो | मगर अपने सचिव पर छापा पड़ते ही वे ऐसे खिसिया गए , जैसे किसी की मेहनत की कमाई छीन ली गयी हो | आखिर यही तो आप चाहते थे कि भ्रष्टाचारी चाहे किसी भी स्तर का हो उसकी जांच बेधड़क की जाए | इस कार्यवाही से आपको तो खुश होना चाहिए था |

विनम्रता

"विद्या ददाति विनयम" अर्थात पढ़ा लिखा व्यक्ति विनम्र होता है; IIT से स्नातक केजरीवाल के संदर्भ में यह सूक्ति भी निरर्थक है | अन्ना आंदोलन की सबसे बड़ी खूबसूरती यह थी, कि इतना अपार जनसमर्थन मिलने के बाद भी अन्ना ने कभी किसी नेता को अपशब्द नहीं कहे | आंदोलन एक आदर्श शांति से चला | मगर मुख्यमंत्री बनने के बाद केजरीवाल ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे भारत के प्रधानमंत्री इनके अधीनस्थ हों | क्या इसी वाणी और आचरण के लिए लोग शिक्षित किये जाते हैं?

जनलोकपाल

प्रधानमंत्री बनने की मंशा में अपना पिछला कार्यकाल जिस लोकपाल के बहाने छोड़ कर केजरीवाल चले गए थे, उन्हें उस लोकपाल की याद आठ महीनों तक नहीं आयी , और जब आयी भी तो उस लोकपाल को ऐसा मज़ाक बना कर रख दिया कि उसपर चुटकुले चलने लगे | क्या केजरीवाल सत्ता सञ्चालन को मज़ाक समझते हैं, या वाकई में उन्हें समझ नहीं है ?

लोकतान्त्रिक भावना

रामलीला मैदान में हुआ आंदोलन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक बेहतरीन उदाहरण था, मगर उसके बाद उदित हुई पार्टी का मुखिया अपने ही दल के सदस्यों को बाउंसर्स से धकेलवाता है, फोन पर लात मारने की बात करता है , और सदन में विपक्ष के विधायकों को आये दिन मार्शल बुला कर बाहर करवाता है | क्या जनता का अपार वोट इस दृष्टिकोण को विकसित करने के लिए था कि यदि महिला आयोग आपके विधायक को दोषी माने तो आप महिला आयोग को ही भंग कर दो|

सादगी और VIP कल्चर का विरोध

चुनाव प्रचार के समय एक सादा मफलर बाँध कर "आम आदमी का किरदार" धरे केजरीवाल नेताओं के VIP कल्चर का भारी विरोध किया करते थे , मगर सभी ये जान कर सन्न रह गए कि राजगद्दी मिलने के बाद केजरीवाल की प्राथमिकता अपने विधायकों का "वेतन बढ़ाने वाले बिल" के लिए ज्यादा थी और "जनलोकपाल" बाद में | आश्चर्य इस बात का नहीं कि केजरीवाल बदल गए आश्चर्य इस बात का है कि इतना खुल कर बदल रहे हैं | विधायकों की सैलेरी चार गुना तक बढ़ा दी गई है जो अब भारत के प्रधानमंत्री के वेतन के बराबर होने को है |

स्वच्छ शासन

गुंडागर्दी और भ्रष्टाचार के विरोध का मंचन करते करते केजरीवाल जब सत्ता के शिखर तक पहुंचे उसके आठ महीने के अंदर ही चार विधायक, नकली डिग्री, स्त्री उत्पीड़न और गुंडागर्दी जैसे मामलों में तिहाड़ के अंदर पहुँच गए, कुछ विधायकों पर जांच चल रही है, सचिव डेढ़ लाख विदेशी मुद्रा के साथ पकड़े गए | और जनता स्वच्छ शासन की बाट जोह रही है, हाँ विधायकों की सैलेरी जरूर पूर्ण बहुमत से पास हो गई है |

गंभीरता

केजरीवाल निरंतर रिलीज़ होने वाली फिल्मों को देख कर उनका रिव्यु अपने ट्विटर हैंडल से देते हैं ; इतना ही नहीं वे लोगों से सिफारिश भी करते हैं कि अमुक फिल्म देखने जाइए | यह सच में हैरान कर देने वाला है, कि एक मुख्यमंत्री को फिल्म देखने की फुर्सत मिल कैसे जाती है | समानांतर में देश का एक प्रधानमंत्री भी है जिसने 18 महीनों के कार्यकाल में एक दिन की छुट्टी तक नहीं ली | क्या कहीं से भी लगता है कि केजरीवाल अपने राज्य के मुखिया के तौर पर कहीं से भी गंभीर हैं? क्या फिल्मों का रिव्यू देने के लिए बने हैं मुख्यमंत्री?

इस सवाल पर सांप सूंघ गया केजरीवाल को, नहीं दे पाये कोई जवाब

क्या दिल्ली सचिवालय में सीबीआई के हाथ कुछ और भी लगा है? इतना क्यों बौखलाए केजरीवाल ?

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